Friday, 12 October 2012

अपना सा वो शख्स ...

दौड़ती भागती ज़िन्दगी के आईने में जब दिखा अपना अक्स
बड़ा ही अनजाना अन पहचाना सा लगा वो शख्स ...

न हैं वो लम्बे घुंघराले बाल , जो उलझ पड़ते थे
न वो शर्माती भारी पलकें, जो लरज जाती थीं
न हैं वो सुर्ख होंठ, जो काँप जाते थे
न वो गीली मुस्कान, जो ख़ुशी से बल खाती थी

सहजती संभलती ज़िन्दगी के आईने में फिर जब गौर से देखा अपना अक्स
बड़ा करीब का, पहचाना, अपना सा लगा वो शख्स ...

वो करीनेदार संवरे बाल, घुँघर कुछ कम और कम उलझन
चमकती आँखें, लरज कुछ कम और कम बंधन
वो गहरे गुलाबी होंठ, कुछ कम स्पंदन और कम्पन
उजली मुस्कान, न कुछ कम बस बढाती अपनापन

तब दिखा कि न बदला कुछ ...
वही निश्छल हंसी, साहसी और खनकती
बहुत कुछ कर जाने की चाह भरती
मुक़द्दस जी लेने की आस बंधाती
कभी होठों को छु सुर्ख बनाती
कभी आँखों तक पहुँच उन्हें शर्माती
और बालों के घुँघर को सहला कर
कुछ कम ही पर आज भी उलझा जाती

ज़िन्दगी से लबरेज़ ज़िन्दगी के आईने में जब झिलमिलाता है अपना अक्स
कुछ उलझा सा पर हँसता मुस्कुराता, खुद सा ही लगता है वो शख्स ...

~Rashmi~












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