Monday, 8 October 2012

कौन जाने ...


कैसा होता है न जिंदा दिल को दफना देना
वो पड़ जाता है नीला और मिट्टी लाल
जो फूल खिलते हैं वो स्याह सफ़ेद
बेलें होती हैं रगों सी हरी
लिपट जाती हैं यादों के पैरों से
जो धुआं धुआं बेरंग से 
पहुँच जाते है जब तब 
उस कब्र पर जाने क्या चढाने
जाने कौन से जाले हटाने
जाने किस लिखे पर से सूखे पत्ते और धूल हटाने
स्याह सफ़ेद फूलों के बीच लाल गुलाब बिछाने
शायद ये सोच कि दफ़न दिल लाल रंग जायेगा
कब्र में दबा भी सांस ले जी जायेगा

शायद...क्या पता कुछ दिल ऐसे भी जी जाते हैं
~Rashmi~

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