Saturday, 20 October 2012

क्या मैं न भूल जाती तुझे...

जो न होती चाह तुझे
तो क्या तू चाहता मुझे
जो दिल की बात सुनी होती ज़िन्दगी ने तेरी
तो क्या यूँ अनसुनी करता तू बात मेरी

जो न होता तुझे ज़रुरत का प्यार
तो क्या होती मेरे दिल की हार
जो न होता तू सयाना इतना
तो क्यों न मुझे मिलता प्यार मेरे प्यार जितना
जो न तुला होता तू ज़िन्दगी के नफे नुक्सान में
तो न मेरी मोहब्बत हलकी बैठती उस तराजू के पलड़े में


और आज भी ...


जो न होती तड़प तुझे
तो क्या यूँ तड़पाता तू मुझे
जो तू भूल गया होता मुझे
तो क्या मैं न भूल जाती तुझे


~Rashmi~

2 comments:

  1. पहले थोड़ा उलझ सी गयी कुछ पंक्तियों में.....शायद एहसासों की उलझन अल्फाजों में झलक रही है....
    हाँ मगर अच्छा लगा पढ़ना...
    क्यूंकि शायद तुम्हारे एहसासों को पढ़ने के लिए मुझे लफ़्ज़ों की दरकार नहीं.....
    प्यार
    अनु

    ReplyDelete
  2. एहसास कुछ मेरे हैं...और बहुत से कुछ इधर उधर बिखरे जो मुझे दिखे, मैंने समेट लिए शब्दों में ...
    हाँ...मुझे समझने वालों को मेरे एहसास समझने के लिए शब्दों की दरकार हो भी नहीं सकती...शब्दों से मुझे समझा ही नहीं जा सकता न मिनीदी..

    ReplyDelete

Visitors