Tuesday, 16 October 2012

एक अनुत्तरित प्रश्न...


बस एक ...
एक अनसुलझा सवाल
एक अनुत्तरित प्रश्न
...क्यों चले गए तुम
और क्यों आये ही तुम...

सपनों की सुनहरी दुनिया में, ख्वाहिशों की पतंग उड़ाने
नाज़ुक सी डोरी लेकर,अगिनत इन्द्रधनुषी रंग पिरोने
बारिश की ठंडी फुहारें बरसाने
मेरे बावरे मन को मोर सा नचाने
उस लुप्त हुई सरिता को फिर से नदी बनाने
रेगिस्तान हुई ज़मीं पर फिर हरियाली लहलहाने
अपने में ही खोई रहने वाली आँखों में मुस्कुराने
दर्द में भी हँसते होंठों को कंपकपाने
क्यों...क्यों आये ही तुम
क्या मेरे मौन मन को मृत मान चिता जलाने
या उमंगों की चिंगारी ले, ज़िन्दगी की रौशनी दिखाने
फिर...क्यों चले गए तुम
बस एक
एक अनसुलझा सवाल
एक अनुत्तरित प्रश्न
~Rashmi~

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