Tuesday, 16 October 2012

चंचल मन...

न देखने का मन है
न सुनने की धुन है
जा ओ मन से खेलने वाले
अब न ही तेरी तस्वीर रंगने का मन है

न कहनी अब हमें कोई कहानी
न है दिल को कोई कविता सुनानी
अब हम समझे
यूँ ही खेल खेलना तो है तेरी आदत पुरानी

न समझनी है तेरी बातें सयानी
न है गहरी कोई प्रीत जतानी
अब हम बूझे
खूब आती हैं तुझे बातें बनानी

न हम समझे हैं न तुम समझोगे
न संभलेगा, ये तो चंचल मन है 
न अभी ... न कभी ...

न तुमको भूलने का मन है
न तुम्हारा भुलाने का मन है
बस हम ये समझे
यूँ भूलना भुलाना बड़ा मुश्किल जतन  है 

हम भी समझे,तुम भी समझे
न हम भूले हैं, न तुम भूलोगे 
न अभी ... न कभी ...

~Rashmi~


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