Wednesday, 10 October 2012

सुखद अंत...

पढ़ते पढ़ते एक कहानी यूँ ही पढ़ बैठी
दिल में उतर गयी वो सुखद अंत की कथा
सोचते सोचते एक ख्याल सोच बैठी
क्या ऐसा मिलन, उम्मीद का पूरा होना, होता है यहाँ
वो तो थी एक कहानी जो आँखों में पानी ले आई
क्या सच में होता है कि इंतज़ार की इन्तहा होठों पर हंसी ले आये
पात्र  में डूबकर रची जाती है रचना
क्या सच में होता है की पात्र को जी ज़िन्दगी पा ले कोई

शायद...नहीं, ज़िन्दगी कोई कहानी है क्या

~Rashmi~

4 comments:

  1. ज़िन्दगी कहानी ही तो है......
    हम पात्र हैं मगर रचनाकार कोई और.....काश के हम अपनी कहानी के लेखक खुद होते :-)

    अनु

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    1. फिर यह कहना ज्यादा सही है की...कहानी ज़िन्दगी होती है क्या...

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  2. आपके रचना संसार से गुज़रना सुखद लगा। मन की सीधी सादी बातें, पारदर्शी भाषा और कहीं ये सोच नहीं कि रचनाकारों की किसी दौड़ का हिस्‍सा हैं1 फ़कीराना अंदाज1 बनाये रखें

    सूरज

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  3. धन्यवाद् सूरज प्रकाश सर ...आपका आशीष बना रहे...अंदाज़ भी बना रहेगा, सच कहूं तो लिखने से पहले और उसके बाद मैं कुछ सोचती ही नहीं...न विन्यास न भाषा शैली ...जो दिल में उभरता है...बस लिख देती हूँ...कोरी भावनाएं.

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